अपनी-अपनी पीर- आचार्य भगवत दुबे

 अपनी-अपनी पीर- आचार्य भगवत दुबे


दोहे


(1) 

जिसके इंगित पर बना, यह सुंदर संसार। 

बोलो वह कितना सुगढ़, होगा रचनाकार।।

(2) 

ईश्वर के प्रति यदि रखें, भक्त अडिग अनुराग। 

प्रभु कर देंगे प्रज्ज्वलित, स्वयं भक्ति की आग।।

(3)

चाहे ‘वाहे’ गुरु कहो, या ईश्वर अल्लाह। 

सच्चे श्रद्धावान के, होते माफ गुनाह।।

(4)

ईश्वर-चिन्तन में सतत, रहता जिनका ध्यान। 

उनके अन्तस में स्वयं, बसते हैं भगवान।।

(5)

समाधिस्थ तन-मन रहे, निर्मल रहें विचार। 

भगवन ऐसी साधना, करते हैं स्वीकार।।

(6)

जिसकी आभा हो रही, कण-कण में द्यतिमान।

जीव-जन्तुओं में करे, प्राणों का संधान।।

(7)

जो कहते हैं काल्पनिक, दशरथ-नंदन राम। 

वामपंथ के हैं वही, मन से मूढ़ गुलाम।।

(8)

साईं उसको क्या मिले, जो दंभी सम्पन्न। 

सच्ची श्रद्धा-भक्ति से, दर्शन करें विपन्न।।

(9)

विपदाओं को देखकर, हो मत व्यथित अधीर। 

रखो धैर्य विश्वास दृढ़, शंभु हरेंगे पीर।।

(10)

ईश्वर पर विश्वास तुम, रखना सदा अटूट। 

अविश्वास से भक्ति की, डोर न जाये छूट।।

(11)

मिलता ईश्वर-भक्ति से, हमको परमानन्द। 

मन होने पाये नहीं, निरासक्त स्वच्छन्द।।

(12)

दीन-दुखी के रूप में, हैं प्रभु तेरे पास।

मानवता पर राखिये, सदा अडिग विश्वास।।

(13)

रहे बिना जल, वायु के, जीवित यदि इन्सान। 

तो मानें प्रभु से बड़ा, है आयुर्विज्ञान।।

(14)

धरा, व्योम, पाताल तक, जो अदृश्य है व्याप्त। 

उस ईश्वर को कर सकें, हम अनुभव से प्राप्त।।

(15)

सहते रहते हैं विवश, अपनी भूख-पिपास। 

फिर भी ईश्वर पर अडिग, रखते हैं विश्वास।।



(16)

विषम परिस्थिति हो भले, रखिये धैर्य विवेक। 

ईश्वर पर विश्वास की, टले न अपनी टेक।।

(17)

भाग्य-लकीरों में दिखे, भले विधाता वाम। 

उनको शुभ, जो शंभु को, सुमिरे आठों याम।।

(18)

जिनके तन पर झूम कर, लिपटे रहें भुजंग। 

जला, शंभु ने काम को, जीवित किया अनंग।।

(19)

वेग प्रभंजन का भला, कौन सका है थाम। 

पवनपुत्र वश में रहें, जब दुलरायें राम।।

(20)

पवन-वेग से उड़ चले, पवन-पुत्र तैराक।

रुके नहीं आगे बढ़े, खड़ा रहा मैनाक।।

(21)

दामोदर श्रीकृष्ण थे, और वृकोदर भीम।

लम्बोदर का बुद्धिबल, पूजित प्रथम असीम।।

(22)

रण से हुआ परांगमुख, जब अर्जुन का ध्यान। 

दिया पार्थ को कृष्ण ने, तब गीता का ज्ञान।।

(23) 

आकुल-व्याकुल हो गये, सारे गोपी-ग्वाल। 

ज्यों ही मथुरा को गये, यदुनन्दन गोपाल।।



(24) 

गोकुल-बरसाना रहे, सदा एक मन-प्राण। 

सच्चे पावन प्रेम के, राधाकृष्ण प्रमाण।।

(25) 

अभिमंत्रित कर राम ने, छोड़े विशिख समूह। 

ढहा दशानन के दिये, दंभी गढ़ प्रत्यूह।।

(26) 

धरती पर आते विबुध, लेकर विविध शरीर। 

अन्त करें अन्याय का, हरें मनुज की पीर।।

(27) 

विष्णु शेषशायी तथा, हैं विषपायी शंभु। 

नागों से शोभित रहे, शैया, ग्रीवा कंबु।।

(28) 

रखें कलानिधि शीश पर, प्रभु शंकर भगवान। 

गंग-संग विषब्याल तक, सज्जा के सामान।।

(29) 

करें बाल-लीला बहुत, अनुजों के सँग राम। 

रचें रास-लीला वहीं, गोप-गोपियाँ-श्याम।।

(30) 

संतों के सानिध्य का, वैभव जिनके पास।

छाया रहता है वहाँ, आध्यात्मिक मधुमास।।

(31)

अहंकारवश भिक्षु का, मत करना अपमान। 

जाने कब किस रूप में, आ जायें भगवान।।



(32)

कृष्ण कन्हैया ने किया, ‘मधु’ भट का संहार। 

मधुसूदन के नाम की, गूंज उठी जयकार।।

(33) 

जो ज्ञानी देकर गये, सारस्वत सौगात। 

कर्जदार हम, वे धनी, सभी ज्ञात-अज्ञात।।

(34) 

चाहत महलों की नहीं, जो हैं सन्त फकीर। 

ठुकरा देते गर्व से, वे जग की जागीर।।

(35)

सज-धज कर आते नहीं, सभा-मध्य विद्वान।।

उनकी विद्वत्ता उन्हें, रखती आभावान।।

(36) 

जिनके मन में हैं नहीं, किंचित कुटिल विचार।

प्राप्त करें, संसार में, वे आदर सत्कार।।

(37)

वाणी पर संयम रखो, जहाँ रहें विद्वान। 

बिना विचारे बोलकर, पाओगे अपमान।।

(38) 

विद्वानों के बीच में, रखें रदन-पट बन्द। 

लें उनके संवाद का, चुप रहकर आनन्द।।

(39) 

सांसारिकता से परे, रहे अहिंसक शुद्ध। 

महावीर, गाँधी तथा, हुए तथागत बुद्ध।।



(40)

जिनमें चारु चरित्रता, लज्जा ललित ललाम। 

उन ललनाओं ने किया, कुल का ऊँचा नाम।।

(41) 

लक्ष्मण औ’ शत्रुघ्न ये, सगे सहोदर भ्रात। 

दशरथनन्दन थे उभय, रही सुमित्रा मात।।

(42) 

उमा, रमा इन्द्राणियाँ, सभी दिव्यता-मूर्ति। 

करतीं करुणा-भाव से, सबकी इच्छा-पूर्ति।।

(43) 

नन्हें नटखट जब कभी, जाते हमसे रूठ। 

उन्हें मनाने बोलते, जाने कितने झूठ।।

(44) 

जाति-धर्म से दूर है, बच्चों का संसार। 

घृणा-द्वेष नफरत नहीं, जानें निश्छल प्यार।।

(45) 

मन से मानव-जाति का, करिये मंगल-गान। 

तभी विश्व-कल्याण का, होगा नया विहान।।

(46)

कभी आंशिक तो कभी, ग्रहण पूर्ण खग्रास। 

समझें हम विज्ञान को, तजें अंधविश्वास।।

(47) 

रेवातट पर मालवा, है उर्वरा कछार। 

भरती रही अनाज से, भूमि विपुल भंडार।।



(48)

सिखा दिया है विश्व को, गणित और विज्ञान। 

भारत ने ही है दिया, उसे दशमलव ज्ञान।।

(49) 

परिवर्तित करता प्रकृति, कभी ग्रहों का योग।

यह खगोल का खेल है, मत मानो दुर्योग।।

(50) 

लोक रीतियों को कभी, वृथा न कहिये आप। 

जीवन के गतिमान हों, इनसे क्रिया कलाप।।

(51) 

अब तक झुलसाते मुझे, श्रमिकों के सन्ताप। 

करते हैं बेचैन वे, क्रन्दन और विलाप।।

(52) 

फिरते हैं अब भी यहाँ, भूखे वस्त्र-विहीन। 

इज्जत ढंकने के लिये, हैं दुर्लभ कौपीन।।

(53) 

भूख-प्यास की भी भला, होती कोई जात। 

विपदा किन्तु गरीब को, देती रहती मात।।

(54) 

पड़ते रहते हैं, जहाँ, सूखा और अकाल। 

ऐसी जगहों पर खुलें, फैक्टरियाँ तत्काल।।

(55) 

गोपन रखते सर्वदा, अपने मन की पीर। 

पीड़ा को जो पी सके, वही धीर गंभीर।।



(56) 

डली नमक की, साथ में, सूखी रोटी प्याज। 

चल पड़ता है काम पर, निर्धन श्रमिक समाज।।

(57) 

भूख, गरीबी का यहाँ, है संबन्ध प्रगाढ़। 

इनका भोजन छीनती, शोषणकारी दाढ़।।

(58) 

यूँ तो उन्नति कर रहा, अपना हिन्दुस्तान। 

सुलभ न कुछ को आज भी, भोजन, वस्त्र, मकान।।

(59) 

मंदिर, मस्जिद, चर्च में, मत कराइये बैर। 

ईश्वर, अल्ला, ख्रीष्ट तो, चाहें सबकी खैर।।

(60) 

भाईचारे की हमें, शिक्षा देते गाँव। 

जहाँ न जम पाते कभी, घृणा, द्वेष के पाँव।।

(61)

माँ के चरणों में रहे, जिनकी निश्छल भक्ति। 

प्रभु अपने आशीष की, देते उनको शक्ति।।

(62) 

है पुरखों की कीर्ति का, आस-पास मकरंद।

उनके प्रति आभार के, मैं रचता हूँ छंद।।

(63) 

आगन्तुक-सँग प्रेम से, मिलिये बाँह पसार।

भले शत्रु ही हो खड़ा, आकर अपने द्वार।।



(64) 

था इस भारतवर्ष में, सदा सनातन धर्म। 

हैं जिसके अनुसरण में, सारे सात्विक कर्म।।

(65) 

प्राणवन्त सद्भाव से, अब भी दिखते गाँव। 

रिश्तों की छतनार है, जहाँ घनेरी छाँव।।

(66) 

जहाँ अतिथि सत्कार हो, मिले बड़ों को मान। 

खुशियों का रहता वहाँ, शीतल सघन वितान।।

(67) 

किया नवागत अब्द का, अभिनन्दन सत्कार। 

कर ली उत्सव धर्मिता, इसी तरह साकार।।

(68) 

चैत्र मास की प्रतिपदा, नव संवत्सर मान।

हम विक्रम आदित्य का, करते गौरव-गान।।

(69)

अधुनातन के सामने, चुने पुरातन कौन। 

देख सभ्यता का चलन, संस्कृति रहती मौन।।

(70)

नीरज, पंकज, तामरस, सरसिज नाम अनेक। 

लक्ष्मीजी को प्रिय लगे, कमल सरोरुह एक।।

(71) 

सदाचार से ही मिले, पुरस्चरण को मान। 

और मंगलाचरण है, ईश्वर का गुणगान।।



(72) 

होता है संसार से, जब वैराग्य-विमोह। 

तकें साधना के लिये, ऋषि-मुनि कंदरखोह।।

(73) 

उनको क्या संसार से, जो पागल विक्षिप्त। 

फिरते हैं अवधूत से, माया से निर्लिप्त।।

(74)

जिन पुरुषों के नाम से, अर्पित करते पिंड। 

कहते हिन्दू-धर्म में, उनको सभी सपिंड।।

(75) 

बहुत सगे भी भूलवश, रखते हमसे द्रोह। 

उनका भी करते नहीं, हम बर्दाश्त विछोह।।

(76) 

पाहुन कभी पधारते, रहते दिन दो-चार। 

पकवानों से नित्य प्रति, होता है सत्कार।।

(77) 

गाते किन्नर द्वार पर, ताली दे दे गीत। 

ये ढोलक की थाप पर, लेते हैं मन जीत।।

(78) 

अगर मनाएँ हम सभी, मानवता का पर्व। 

अपनी संस्कृति पर करें, नई पीढ़ियाँ गर्व।।

(79) 

हमें बचाना है अगर, सामाजिक सद्भाव। 

बच्चों में मत बाँटिये, नफरत, घृणा, दुराव।।



(80) 

है कितनी उपयोगिता, करते नहीं विचार। 

सिर्फ दिखावे के लिये, लगा रहे अम्बार।।

(81) 

युवकों में उत्तेजना, भरता चुस्त लिबास। 

विचलित करे समाज को, समयपूर्व मधुमास।।

(82) 

गलत सोच मत राखिये, अथवा घृणित विचार। 

होते हैं हस्तांतरित, सन्तति को संस्कार।।

(83)

नारी का सौंदर्य यदि, दिखे आवरणहीन। 

मर्यादा होती वहाँ, गर्हित और मलीन।।

(84)

सहन कभी मत कीजिये, संस्कृति का अपमान । 

मिट जायेगी अन्यथा, पुरखों की पहचान।।

(85)

वचनों से होती प्रकट, वक्ता की औकात। 

अतः कहीं भी कीजिये, सोच समझकर बात।।

(86) 

भोंडापन अपना रहे, लोग समझकर शान। 

देश न खो देवे कहीं, सांस्कृतिक पहचान।।

(87)

होवे चातक की तरह, प्रिय के प्रति विश्वास। 

पीकर केवल स्वाति जल, बुझे कंठ की प्यास।।



(88) 

बड़े गवैये छेड़ते, जब मधुरिम आलाप। 

सुनें ध्यान से, बंद कर, अपने क्रिया-कलाप।।

(89)

गुरु रवीन्द्र टैगोर थे, काव्य-कला आगार। 

शांति निकेतन का दिया, भारत को उपहार।।

(90) 

आज खरीदे जा रहे, अभिनन्दन, सम्मान। 

चाटुकारिता पुज रही, हुआ उपेक्षित ज्ञान।।

(91) 

आदि अनुष्टुप छन्द से, बही काव्य-रस-धार। 

किया आदि कवि ने तभी, राम-कथा-विस्तार।।

(92) 

पीड़ा दीन-दरिद्र की, जब देती झकझोर। 

कवि लिखता कविता तभी, होकर भाव-विभोर।।

(93) 

डिगा नहीं पायी जिसे, दुनिया की जागीर। 

वह निर्भय, पाखण्ड से, टकरा गया कबीर।।

(94) 

लोक मांगलिक काव्य को, मिलता है सम्मान। 

‘राम चरित मानस’ रचा, पढ़ता जिसे जहान।।

(95) 

अनायास जिस नाद की, हो जाती व्युत्पत्ति। 

वह सरगम संगीत की, बन जाती सम्पत्ति।।



(96) 

शब्द-सम्पदा का सृजन, करते रचनाकार। 

भरते गढ़कर शब्द नव, सारस्वत भंडार।।

(97) 

ईश्वर ने जिनको दिया, कविता का वरदान। 

सार्वजनिक हित में करें, शब्दों का संधान।।

(98) 

वही पिष्ट-पेषण किया, तुमने बारम्बार। 

मतलब की बातें मगर, कह न सके दो चार।।

(99) 

तमसा-तट पर क्रोंच-वध, क्रोंची करे विलाप। 

भरा आदि कवि ने तभी, करुण काव्य आलाप।।

(100) 

जबकि तमिस्रा में मलिन, हो निशिकर की जोत। 

तब पावस की रैन में, निकल पड़ें खद्योत।।

(101) 

सतो रजोरस ताम रस, हैं मानव मन-बीच।

 भिन्न परिस्थिति में मनुज, देता उन्हें उलीच।।

(102)

छप्पय, कवित, घनाक्षरी, या कुंडलिया छन्द। 

छान्दस कविता से सदा, मिलता है आनंद।।

(103) 

काव्य-विधा में छंद का, कर विधिवत संधान। 

कवि, विधि के वरदान से, पाते हैं सम्मान।।



(104) 

लिखते क्रिया-कलाप जो, दैनंदिनि में नित्य। 

उसे शोध की मान्यता, देता है साहित्य।।

(105) 

रहती व्यंग्य-विनोद की, हर समाज में माँग।

 इसीलिये तो मसखरे, रचते नाना स्वाँग।।

(106)

जिसके ऊपर शारदे, करें कृपा की वृष्टि। 

कर लेते हैं वे सुजन, सरस काव्य की सृष्टि।।

(107)

होवे वर्गों की सुयुति, मात्राओं का भार। 

बनती यति-गति-ताल से, कविताओं की धार।।

(108)

मुक्तक में होता नहीं, कोई पूर्व प्रसंग। 

दोहा, मुक्तक, शे’र का, पृथक निराला ढंग।।

(109) 

आमुख भी सुन्दर रहे, और केन्द्र-विस्तार। 

पुस्तक की पठनीयता, पाती है आधार।।

(110) 

गाथा सुनकर शौर्य की, लगें फड़कने अंग।

सुन ओजस्वी काव्य को, वीर जीतते जंग।। 

(111) 

रचना सरस प्रवाह युत, छान्दस कविता गेय। 

सम्मानित होता सदा, कवि का सफल प्रदेय।।



(112) 

‘काव्य-पटल’ का आजकल, प्रचलित हुआ रिवाज। 

पढ़कर कविता, मान्यता, देता विबुध समाज।।

(113) 

खा अपथ्य, पाले स्वयं, हमने उदर-विकार। 

सुन्दर तन-मन के लिये, लेवें शाकाहार।।

(114) 

उछल-कूद कर हिरणियाँ, विचरें वन के बीच। 

हत्या करे बहेलिया, तभी घेर कर नीच।।

(115) 

रहें बिजौरे साथ में, पापड़, बड़ी, अचार। 

करते चटनी, रायता, भोजन को रसदार।।

(116) 

जिस भोजन के साथ हो, प्रेम, ललक, सत्कार। 

गृहिणी का यह भाव ही, करे जायकेदार।।

(117) 

आकर्षण के केन्द्र हैं, भड़कीले बाजार। 

लुटकर भी पुलकित दिखें, लोग विवश, लाचार।।

(118) 

आमिष-भोगी हो गये, कितने क्रूर नृषंस।

इनके पापी पेट में, समा गये गोवंष।।

(119) 

धरती की हरियालियाँ, लीं मनुष्य ने लील।

मरते जाते वन्य पशु, मौज मनाते चील।।



(120) 

मानव, संकट-काल में, रखे धैर्य विश्वास।

काट सके पुरुषार्थ से, खुद विपदा के पाश।।

(121)

असफलता को मानते, कर्महीन, दुर्भाग्य। 

स्वस्थ निरोगी तन मिला, यह क्या कम सौभाग्य।।

(122) 

कभी न मिटने दीजिये, स्वाभिमान-अस्तित्व। 

त्याग-तपस्या कर्म से, बनता है व्यक्तित्व।।

(123) 

आते हैं फुफकारते, जब विपदा के ब्याल। 

सकता उनका आक्रमण, केवल धैर्य सम्हाल।।

(124) 

घनीभूत पीड़ा सहन, कर लेते जो धीर। 

कर्ण-सदृश होते अमर, इतिहासों में वीर।।

(125) 

जीवन-यापन के लिये, रहे ठोस आधार। 

भले नौकरी हो नहीं, करें बंज-व्यापार।।

(126) 

रोजी-रोटी के लिये, है उद्यम अनिवार्य। 

सबको करना चाहिये, छोटे-मोटे कार्य।।

(127) 

होवे इच्छा शक्ति तो, मिलते कई विकल्प। 

उद्यम में जुट जाइये, लेकर दृढ़ संकल्प।।



(128) 

क्या अरण्य-रोदन कभी, खींच सकेगा ध्यान। 

अतः मुखर होकर करो, गर्जनयुत आह्वान।।

(129) 

जिनकी जंघा-पिंडली, होती हैं मजबूत। 

वे बलिष्ठ श्रम-शक्ति का, देते सदा सबूत।।

(130) 

भले गूंजते रात भर, तमीचरों के तूर्य। 

तिमिर छंटे अज्ञान का, उदित ज्ञान का सूर्य।।

(131) 

रावण ने फिर ले लिया, कलियुग में अवतार। 

दशों दिशाओं में दिखे, दानव भ्रष्टाचार।।

(132) 

जो रखते हैं जेब में, पुलिस और अखबार।

कौन उजागर कर सके, उनके पापाचार।।

(133) 

स्वयं बनी रणचंडिका, दुर्गावती महान।

दुश्मन से लड़ते हुए, दिया अमर बलिदान।।

(134) 

पराधीनता का कठिन, सह न सका संताप। 

हल्दीघाटी गा रही, उसका शौर्य-प्रताप।।

(135) 

लूट-लूट जिनने भरा, अपने घर में माल। 

वे ही तो संतुष्टि से, रहते हैं कंगाल।।



(136) 

धूर्त बेचकर खा रहे, जो अपना ईमान। 

सच्चाई की शक्ति का, उन्हें नहीं है भान

(137)

पूँजीपतियों में हुआ, जल्दी जिनका नाम। 

नीरव, माल्या की तरह होते हैं बदनाम।।

(138) 

जमाखोरियों के अगर, खुल जावें गोदाम।

कालाधन आये वही, असहायों के काम।। 

(139) 

नेता, अधिकारी, पुलिस, लेते माल डकार। 

कौन भला फिर देश में, रोके भ्रष्टाचार।।

(140) 

बिना परिश्रम के किया, जिसने वित्त-विकास। 

ऐसे नर करते नहीं, ईश्वर पर विश्वास।।

(141) 

अमरबेल की भाँति है, यह तृष्णा की चाह।

जिसके मन-तरु पर चढ़े, करती उसे तबाह।।

(142) 

सुविधा-शुल्क बखान कर, कहते शिष्टाचार। 

बेशर्मी से कर रहे, वे ही भ्रष्टाचार।।

(143) 

आपाधापी ने लिये, सुख के अवसर छीन। 

अब दौलत की चाह में, मानव हुआ मशीन।।



(144)

जिसने अपने स्वार्थ में, भुला दिया कर्तव्य। 

उज्ज्वल फिर वैसे भला, हो सकता भवितव्य।।

(145) 

निरपराध पर भी पड़े, अगर पुलिस की मार। 

प्राण बचाने के लिये, करे जुर्म स्वीकार।।

(146) 

सत्य, ज्ञान, ईमान का, करना नहीं घमंड। 

आज दिलाया जा रहा, सच्चाई को दण्ड।।

(147) 

बेईमानी की रखी, दौलत खूब बटोर। 

जिसको समझे साधु वह, निकला डाकू, चोर।।

(148) 

जिनकी रग-रग में भरा, शोषण, भ्रष्टाचार। 

महिमा-मंडित हो रहे, आज वही किरदार।।

(149) 

दौलत-संचय के लिये, करना कभी न होड़। 

तृष्णा और विनाश का, रहता है गँठजोड़।।

(150) 

जिनने बेचे स्वार्थ में, धर्म, सत्य, ईमान। 

उनके ऊपर क्यों भला, रुष्ट न हों भगवान।।

(151) 

उत्तर का प्रहरी अडिग, जैसे खड़ा हिमाद्रि। 

वैसे ही मरु भूमि में, पश्चिम का सहयाद्रि।।



(152) 

चौपट बस्ती कर गया, दिये घरोंदे तोड़। 

कर विनाश तूफान ने, दी निशानियाँ छोड़।।

(153) 

गौमुख से गंगा चली, लेकर पतली धार। 

यू.पी. और बिहार में, किया अमित विस्तार।।

(154) 

आता है तूफान जब, देता गाँव उजाड़। 

करवाता भू का स्खलन, देता विटप उखाड़।।

(155) 

जंगल से मिलते रहे, बेर, करोंदा, चार। 

जंगल काटे, हो गये, पशु-पक्षी लाचार।।

(156) 

तरु-पल्लव पर राजती, किरण सांध्यकालीन। 

अस्ताचल की लालिमा, होती ललित नवीन।।

(157) 

धुआँधार विख्यात है, उज्ज्वल, धवल प्रपात। 

चौंसठ जोगिनि के निकट, घर्घर स्वर दिन-रात।।

(158)

शीतल करती प्राण-मन, पानी की बौछार। 

बूंद-बूंद संचित करो, पानी प्राणाधार।।

(159) 

फूले बेला, चाँदनी, जुही, लिली, कचनार। 

बिछ जाते हैं भूमि पर, झर-झर हरसिंगार।।



(160) 

जालिंगन तरु का कर, यौवनवंती बेलि।

और चढ़ती जाती चूमती, करे विटप सँग केलि।।

(161) 

हरे-भरे जंगल रहें, वृक्ष सघन, छतनार। 

छन-छन कर आती रहे, शीतल मंद बयार।।

(162)

है मेघालय राज्य में, सुन्दर शहर शिलांग। 

मोहक पर्वत घाटियाँ, प्रकृति छटा सर्वांग।।

(163) 

मिले किसी को खाद-जल, दूजे को संत्रास। 

गमलों में पाटल खिलें, वन में खिलें पलाश।।

(164) 

वक, शुक, पिक, मैना, चपल, तीतर, लवा, बटेर। 

अपनी बोली में सजग, करें लगाकर टेर।।

(165) 

बिखरी रहे हरीतिमा, अपने चारों ओर।

निर्भय हो विचरण करें, वक, चातक, पिक, मोर।।

(166) 

अपने धन-बल का कभी, करना नहीं गुरूर। 

दशकंधर के दंभ को, किया राम ने चूर।।

(167) 

पेड़ अडिग रहते सदा, सहते भीषण घाम। 

मात-पिता जैसे हमें, देते छाँव ललाम।।



(168) 

हुआ ‘लॉक डाउन’ रहा, घर-भीतर संसार। 

इसी अवधि में हो गया, पर्यावरण सुधार।।

(169) 

जिनकी श्रद्धा, भक्ति थी, अटल राष्ट्र के नाम। 

वीर शहीदों को विनत, आदर सहित प्रणाम।।

(170)

केसरिया बाना पहन, करें वीर प्रस्थान। 

देते हैं रणभूमि में, राष्ट्र-भक्त बलिदान।।

(171) 

लिये कटारी हाथ में, गयी अटारी बीच। 

सबला ने वध कर दिया, था व्यभिचारी नीच।।

(172) 

स्वाभिमानियों के अगर, देखें बच्चे चित्र। 

राष्ट्र-भक्ति के दें हमें, ये परिणाम पवित्र।।

(173) 

अहंकार से चूर हैं, अब भी सत्तारूढ़। 

पद पाकर औकात को, भूलें दंभी मूढ़।।

(174) 

जब पछुआ पुरवाइयाँ, चलें झपट्टा मार। 

बिजुरी चमके लपलपा, घटा करे बौछार ।।

(175) 

झिलमिल झिलमिल रात में, उड़ते उडुगन वृन्द। 

हीरक दल जैसे दिपें, देते हैं आनन्द।।



(176) 

दादुर की टर्राहटें, झींगुर की झनकार। 

लगे कि ज्यों इक सँग बजे, तबला और सितार।।

(177) 

प्रातः मोती से भरा, दिखे धरा का थाल। 

चुग लेते वे ओस-कण, रवि के किरण मराल।।

(178) 

पतझर ले जाये झरा, सब पीड़ा के पात। 

किसलय उगें उमंग के, होवें पुलकित गात।।

(179) 

बनी-ठनी पुलकित प्रकृति, स्वागत करे वसंत। 

मंजरियों की गंध से, झूमें दिशा-दिगंत।।

(180) 

सात रंग का प्रकृति ने, ओढ़ा नवल दुकूल। 

वनस्थली में झर गये, तब महुआ के फूल।।

(181) 

ऐसे रंग उलीचिये, खेलो ऐसी फाग। 

तन तो रंगीला दिखे, मन निर्मल बेदाग।।

(182) 

लोक धुनों के संग में, बरसे रंग-अबीर। 

प्रेम-रंग में सब रँगें, राजा, रंक, फकीर।।

(183) 

मन में रखें न पालकर, घणा ईर्ष्या द्वेष। 

अपनी ही दुर्भावना, देती हमको क्लेश।।



(184)

माँग अविश्वासी रहे, प्रभु का पुष्ट प्रमाण। 

उन्हें भला कैसे मिले, भव सागर से त्राण।।

(185) 

अविश्वास की लिजलिजी, यदि होगी बुनियाद। 

अधिक दिनों तक वे भवन, रह न सकें आबाद।।

(186) 

ईश्वर के दर पर नहीं, कोई छूत-अछूत। 

समरसता की है भरी, दौलत वहाँ अकूत।।

(187)

पाप करा लेते सदा, नफरत, घृणा, घमंड। 

अहंकार का एक दिन, मिलता निश्चित दंड।।

(188)

अहंकार में चूर जब, होने लगे सवर्ण।

वर्ण-व्यवस्था के हुए, सब उद्देश्य विवर्ण।।

(189)

जो जितने चालाक हैं, उतने ही वाचाल। 

सहज सरल इंसान क्या, समझें उनकी चाल।।

(190) 

भाव कुटिलता से भरे, दूषण-युक्त चरित्र। 

ऐसे कुविचारी कभी, हों क्या सच्चे मित्र।।

(191) 

अन्न, वायु, जल की नहीं, कोई मजहब जात। 

पोषक तत्वों, से भला, होगा कौन कुजात।।



(192) 

मानवीय संवेदना, अगर रहे जीवन्त। 

सामाजिक उद्यान में, छाया रहे वसन्त।।

(193)

आलोचक के साथ भी, रखें सतत संवाद। 

हिल जाती है प्रेम से, नफरत की बुनियाद।।

(194)

भाई चारे का अगर, हो असीम विस्तार। 

सारा विश्व-समाज फिर, हो जाये परिवार।।

(195) 

भूल नहीं सकता प्रिये, कभी तुम्हारी याद। 

कानों में रस घोलते, शहदीले संवाद।।

(196) 

छन्द कपोलों पर रचे, हमने ललित ललाम। 

प्राणों को पुलकित करें, वे सुधियाँ अविराम।।

(197) 

नयन-झील में आपकी, गये तृषाकुल डूब। 

मैं तट पर उतरा रहा, जैसे नन्हीं दूब।।

(198) 

अधरों से झरते सदा, किसलयवंती छन्द। 

साँस-साँस में आपकी, है केशर की गंध।।

(199) 

यौवन पा गदरा गये, गोरी तेरे अंग। 

लगता है सौंदर्य पर, मोहित हुआ अनंग।।



(200) 

तन आलिंगन-बद्ध औ’ अधराधर रसलीन। 

प्रणय-पुजारी ले रहे, अनुभव नित्य नवीन।।

(201) 

अंग-अंग गदरा गये, मधुराधर रसवंत। 

यौवनवंती देह पर, है साकार बसंत।।

(202) 

प्रकृति आपदा के समय, होते लोग।

तबाह दानवीर भी दौड़ते, बनकर भामाशाह।।

(203) 

पढ़, रसवंती उर्वशी, संस्कृति के अध्याय। 

‘दिनकर’ के आगे दिखे, कवि अनेक असहाय।।

(204) 

सज-धज पहुँची मेनका, किया तेज-तप भंग। 

बाहों में ज्यों रति रही, ऋषि हो गये अनंग।।

(205) 

रहीं उर्वशी, मेनका, इन्द्र-सभा की शान। 

तप-भंजन करने रचे, इनने प्रणय-विधान।।

(206) 

नृपति पुरुर्वा उर्वशी, हुए भोग-तल्लीन। 

विश्वमित्र का मैनका, गई तपोबल छीन।।

(207) 

अंजन नयनों में लगा, बना कटीली कोर। 

चितवत चंचल कामिनी, इत-उत चारों ओर।।



(208) 

लोक-बोलियों से हुई, हिन्दी की समृद्धि। 

हमको करनी चाहिये, संरक्षा अभिवृद्धि।।

(209) 

सृजन हेतु प्रेरित करें, देखें उचित सुझाव। 

वन्दनीय हैं मित्र वे, औ’ उनका सद्भाव।।

(210) 

असफल होने पर कभी, होना नहीं निराश। 

देते हैं संतोष धन, अपने पुण्य-प्रयास।।

(211) 

औरों की उपलब्धि पर, जिन्हें मिले आनंद।

ऐसे लोगों पर लिखें, हम आदर के छन्द।।

(212) 

करें अर्चना-वन्दना, और इष्ट का ध्यान। 

सोच तर्कसंगत रहे, बढ़े आत्म-बल ज्ञान।।

(213)

अपने कार्यों का स्वयं, करें आकलन आप।

समालोचना, आपका, हरे सकल सन्ताप।।

(214) 

रसना, भोज्य पदार्थ चख, रख सकती गुण याद।

किन्तु चबाकर भी रदन, बता न सकते स्वाद।।

(215)

नियमावलियाँ ध्यान से, पढ़ें कंडिका वार।

उत्तर देने के लिये, रहें छात्र तैयार।।



(216) 

गोधन, गजधन, बाजिधन, राजाओं की शान।

विद्या धन के सामने, सब धन धूरि समान।।

(217) 

अपने तन की कीजिये, देखभाल भरपूर। 

बने उपेक्षा-भाव से, त्रण का व्रण नासर।।

(218) 

मित्र सगा हो तो करो, अपनी व्यथा बखान। 

चुप रहकर ही अन्यथा, रखो स्वयं का मान।।

(219) 

अपमानित करना नहीं, भले शत्रु का दूत। 

मारे जाते अन्यथा, रावण-सँग सौ पूत।।

(220) 

सर्वनाश खुद का किया, जिनने खेला द्यूत। 

राज-पाट का नाश हो, दौलत लुटे अकूत।।

(221) माटी का लोंदा लिये, वर्तन गढ़े कुम्हार। 

यूँ ब्रह्मा ने रच दिये, सृष्टि रूप आकार।।

(222)

तपोभूमि में ऋषि बटुक, रहें कुशासन डार। 

वहीं पटासन मखमली, महलों के श्रृंगार।।

(223) 

बड़ी विधायी शक्तियाँ, हैं संसद के पास। 

कार्यपालिका से बड़ी, न्याय पालिका खास।।

(224) 

पत्नी, भाभी का करें, माता-सा सत्कार। 

तो ममता के सूत्र में, बँधा रहे संसार।।

(225) 

सदा रोक कर राखिये, उत्तेजक आवेश। 

शांति, भंग कर अन्यथा, देगा नाहक क्लेश।।

(226) 

सुखद समापन कार्य का, देता है संतोष। 

मन-वांछित परिणाम का, सुख दायक परितोष।।

(227) 

कभी न करना चाहिये, प्रतिभा का अपमान। 

फलीभूत होकर रहे, ईश्वर का वरदान।।

(228) 

चोट निरन्तर यदि पड़े, खंडित हो चट्टान। 

जैसे रस्सी की रगड़, छोड़े अमिट निशान।।

(229) 

असहनीय अपमान का, महाविकट परिताप। 

सज्जन सह लेते अतः, व्यथा, मौन चुपचाप।।

(230) 

करना मत माँ-बाप से, ऊँच स्वर में बात।

श्रद्धा-आदर के सहित, करें सदा प्रणिपात।।

(231) 

विपदाएँ लेवें अगर, तुमको कभी दबोच। 

रखना संयम धैर्य सँग, आशावादी सोच।।

(232) 

स्वाभिमानियों ने यहाँ, मानी कभी न हार। 

दीपक चढ़कर शीश पर, करे तिमिर पर वार।।



(233) 

हिमगिरि शीतल है मगर, है अन्तस में आग। 

फूट पड़े ज्वालामुखी, गया क्रोध यदि जाग।।

(234) 

धूर्त संगठित हो रहे, चीन, पाक, नेपाल। 

फन कुचलो, डसने लगे, आस्तीनों के ब्याल।।

(235) 

कर्मों का फल भोग कर, चर्चित हुआ बुहान। 

मुँह की खाकर चायना, छोड़ गया गलवान।।

(236) 

रहा चायना युद्ध में, बरबस हमें घसीट। 

एक बार अच्छी तरह, देंगे उसको पीट।।

(237) 

संभव हो तो टालिये, बने जहाँ तक युद्ध। 

होते हैं समृद्धि के, मार्ग सभी अवरुद्ध।।

(238) 

देकर घटिया माल वह, कुटिल हुआ आबाद। 

सबक सिखाने चीन को, त्यागें सब उत्पाद।।

(239)

तुमको माँ के गर्भ में, किसने रखा सम्हाल। 

परम शक्ति वह ईश है, जिसने किया कमाल।।

(240) 

नारी प्रिय लगती तभी, पुरुष-त्रिया हों द्वैत। 

मोह-भंग होने लगे, होते ही अद्वैत।।



(241) 

दादर से दिल्ली तलक, दूरी नापे रेल। 

वायुयान के वेग को, कुछ घंटे का खेल।।

(242) 

माटी का लोंदा धरे, उकईं बैठ कुम्हार। 

चाक घुमाकर कर रहा, घट-मटके तैयार।।

(243) 

पाल रही अभिमन्यु का, वधू उत्तरा अंश। 

जिससे आगे बढ़ सके, भरत नृपति का वंश।।

(244) 

कुरुक्षेत्र के मध्य में, बना स्तम्भ था जैत।

बर्बरीक का सिर रखा, था दृष्टा असर।।

(245)

करें योग व्यायाम नित, निर्मल जल से स्नान।

पावें बुद्धि, विवेक, बल, तेजवंत गुणवान।।

(246) 

नदी अगर बहने लगे, कभी प्यास की ओर। 

वैभव और अभाव का, स्वतः थमेगा शोर।।

(247) 

रजनी गंधा जब खिली, हुई सुगंधित रात। 

अधिक समुज्ज्वल तेजमय, दिखने लगा प्रभात।।

(248) 

हंस अभावों में जियें, धनी वकुल की पाँत। 

दौलत का बढ़ता उदर, श्रम की सिकुड़ी आँत।।



(249) 

नमक मिर्च डाला अधिक, पतली कर दी दाल। 

रहे भूख के आज तक, उत्तरहीन सवाल।।

(250)

महलों में रंगरेलियाँ, बजते पंचम राग।

झोपड़ियों के एक से, रहे दिवाली, फाग।।

(251) 

घर-आँगन हों उल्लसित, जब तुम रहतीं पास।

बिना तुम्हारे हे, प्रिये! मौसम दिखे उदास।।

(252) 

हत्या, डाके, नग्नता, और देह व्यापार। 

नित्य नयी ये सुर्खियाँ, लाते हैं अखबार।।

(253) 

इन्हें न कोई पूछता, मरते श्रमिक किसान। 

चर्चा हो अखबार में, छींके यदि धनवान।।

(254) 

आम्रकुंज बौरा गये, टेसू खेलें फाग। 

जड़-चेतन में भर गया, मानों मन्मथ आग।।

(255)

ले पाया अफसर नहीं, अब तक कार, मकान।

लगता है ईमान की, चलती नहीं दुकान।।

(256) 

यौवन पर करने लगे, जब अनंग आघात। 

दिन हो जाते फागुनी, मादक होती रात।।



(257)

सूट-बूट वाले उन्हें, सिखला रहे तमीज। 

जिनके तन को ढाँकती, थिगड़े लगी कमीज।।

(258) 

पीड़ाओं का एक दिन, निश्चित है अवसान। 

पीड़ा दिल पर छोड़ती, लेकिन अमिट निशान।।

(259) 

उमड़-घुमड़ कर जब झरे, मेघ नगाडे़ पीट। 

आतप को लेकर गये, अपने साथ घसीट।।

(260)

बढ़ने लगा चुनाव का, जब गलियों में शोर। 

दीवारों पर उग गये, नारे चारों ओर।।

(261)

कहने को संसार में, हैं अनेक संबन्ध। 

लेकिन माँ से ही मिले, अपनेपन की गंध।।

(262)

अधरों से चन्दन झरे, अन्दर हैं विषदंत। 

कृत्य दानवी हैं मगर, बने जोगिया संत।।

(263) 

पाया पिंजरा स्वर्ण का, पंछी करे गुमान। 

रट्ट तोता हो गया, गिरवी हुई जुबान।।

(264) 

लूट ग्राहकों को रहे, भड़कीले बाजार।

रिश्वतखोरी के लिये, करती विवश पगार।।



(265) 

चला कहाँ लेकर हमें, तृष्णा का मारीच। 

पछतायी थी जानकी, स्वर्णं नगर के बीच।।

(266) 

जमने मत देना कभी, मन-दर्पण पर धूल। 

आपस की तकरार को, तुरत जाइये भूल।।

(267) 

राष्ट्र-चेतना पा रही, तिरस्कार अपमान। 

बिक जाते हैं आजकल, अकादमिक सम्मान।।

(268)

कूप खनन जिसने किया, बुझी न उसकी प्यास। 

अन्न उगाकर भी कृषक, करता विवश उपास।।

(269) बुरे वक्त में हो गये, सभी हितैषी क्रूर। 

परछाईं भी हो गई, तिमिर देख कर दूर।।

(270)

कामचोर को मिल गया, श्रमसेवी सम्मान। 

यूँ ही बढ़ती जा रही, लोकतंत्र की शान।।

(271)

भले रखा हो पास में, छल-फरेब का कोष। 

सच्चाई के साथ में, रहता है संतोष।।

(272) 

जहरीली चिनगारियाँ, उगलें नेता-नाग। 

झुलसाती सद्भाव को, नफरत वाली आग।।




(273) 

कितना कुटिल बनावटी, है फ्लैटों का प्यार। 

मौत पड़ोसी की हमें, बतलाता अखबार।।

(274) 

बारहसिंहा का टँगा, जिस बैठक में सींग। 

प्रकृति-सुरक्षा की वहीं, हाँकी जाती डींग।।

(275) 

सोना-चाँदी है, बहुत खाना नहीं नसीब। 

दौलत वालों से भले, कर्मठ श्रमिक गरीब।।

(276) 

गंगा-यमुना, भोगती, औद्योगिक संताप। 

ढो, शहरों की गंदगी, करती करुण विलाप।।

(277) 

है परमाण्विक होड़ में, अब सारा संसार। 

हुआ आज विज्ञान का, विस्फोटक विस्तार।।

(278)

अफसर, व्यापारी, पुलिस, कोठीवाले सन्त। 

नेताओं के रूप में, सब दानव जीवन्त।।

(279) 

बेईमानों को मिला, स्वर्ण पत्र सम्मान। 

लेकिन पीड़ा भोगते, शौर्य, सत्य, ईमान।।

(280) 

जहाँ कलारी है वहीं, है खादी भंडार। 

लोकतंत्र में हो गये, गाँधी जी लाचार।।



(281) 

हुई उपेक्षित योग्यता, बेबस विज्ञ कुलीन। 

वे मूढ़ों के मंच पर, बिछा रहे कालीन।।

(282)

मजहब की धर्मान्धता, औ’ नफरत का कोढ़। 

सिसक रही सद्भावना, आज उदासी ओढ़।।

(283) 

कुटिल जुबानों की हुई, कितनी पैनी धार। 

करवा देती हैं यही, पल में नरसंहार।।

(284) 

नेता पक्ष-विपक्ष के, हैं सब एक समान। 

सोच-समझकर ही करें, बुद्धिमान मतदान।।

(285) 

राजनीति में यूँ पढ़े, विघटनकारी पाठ। 

कुर्सी ने करवा दिये, घर के टुकड़े आठ।।

(286) 

नई पीढ़ियाँ दे रहीं, हमें विचार अनेक। 

वृद्धों के चकरा रहे, सुनकर बुद्धि-विवेक।।

(287) 

बना रही है घोंसला, चिड़िया तिनके जोड़। 

हिम्मत औ’ तूफान में, आज लगी है होड़।।

(288) 

विपदाओं को देखकर, होना नहीं निराश। 

मुट्ठी में बाँधे रखो, आशा का आकाश।।



(289) 

डीजल औ’ पेट्रोल के, बढ़ा रहे नित रेट। 

भरा तेलियों का नहीं, शायद अब तक पेट।।

(290) 

अरे, सत्यवादी मना, तू बच्चों की खैर। 

क्यों गवाह बन ले रहा, बाहुबली से बैर।।

(291) 

कितने नेक कृपालु हैं, बरगद, पीपल, आम। 

पशु-पक्षी, मानव जहाँ पाते हैं विश्राम।।

(292) 

राजनीति का देखिये, कितना प्रबल प्रताप।

बाँट रहे हैं डिग्रियाँ, आज अँगूठा छाप।।

(293) 

आँखों में हैं झूलते, नदी सरोवर गाँव। 

ए.सी. कूलर हैं मगर, नहीं बरा की छाँव।।

(294) 

आज स्वार्थ में हो गये, सब रिश्ते बीमार। 

पुरखों के घर में उठी, नफरत की दीवार।।

(295) 

आँसू और समुद्र की, दर्दीली तासीर। 

है खारापन पीर का, पीने योग्य न नीर।।

(296) 

लोहे का टुकड़ा मिला, थी घातक, तलवार। 

बनकर ताला-चाबियाँ, करती है उपकार।।



(297) 

घूम रहा वह देश में, लिखकर कविता चार। 

सम्मानों के लग गये, उसके घर अम्बार।।

(298) 

जहाँ कभी कश्मीर में, थी बारूदी गंध। 

गूंज रही किलकारियाँ, आज वहीं स्वच्छंद

(299)

संयम रखें जुबान पर, औ’ कानों को खोल। 

अधिक सुनें, बोलें मगर, शब्द-शब्द को तोल।।

(300) 

कविता होती कल्पना, सजते जहाँ विचार। 

भाव-लोक का हो मगर, पुस्तक में विस्तार।

(301) 

ओढ़ जिन्होंने है रखा, साम्यवाद का खोल। 

उनके अन्दर गूँजता, पर सामन्ती ढोल।।

(302) 

परिवर्तित रिश्ते करे, चुटकी भर सिंदूर। 

सप्तपदी को पार कर, बेटी जाती दूर।।

(303) 

लोग प्रकृति से क्रूरता, करते बारम्बार। 

क्रुद्ध धरा करती अतः, बरबस नर-संहार।।

(304)

मौलिकता खोने लगी, अब अपनी पहचान। 

जन, गण, मन को छल रहे, आज धवल परिधान।।



(305) 

रीतिकाल को छोड़कर, पकड़ प्रगति की राह। 

कविगण अब लिखने लगे, दीन-दुखी की दाह।।

(306) 

जब तक है अच्छा समय, सभी बढ़ाते हाथ।

परछाईं भी छोड़ती, दिन ढलने पर साथ।।

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